चौसा का युद्ध कब और किसके बीच हुआ || Chausa Ka Yuddh 1539 ई०

प्रिय स्टूडेंट विश्व के इतिहास के अंतर्गत Chausa Ka Yuddh का इतिहास के बारे में पढने वाले है. इस लेख में युद्ध के कारण व परिणाम क्या-क्या है. सारे टॉपिक को एक-एक कर के पढने वाले है.

यह Chausa Ka Yudh कब और किसके बिच लड़ा गया था? यह युद्ध किस स्थान पर हुआ है. जो सन 1539 ई० के चौसा के युद्ध का विजेता कौन है? इस लेख में सारे टॉपिक को पढने वाले है. जो आपके सभी तरह के प्रतियोगी व अन्य परीक्षाओ के लिए अति महत्वपूर्ण है. तो चलिए इस लेख को पूरा अंत तक पढ़ते है.

  • चौसा का युद्ध कब लड़ा गया था ?
  • चौसा का युद्ध के कारण और परिणाम ?
  • चौसा का युद्ध किस नदी के किनारे हुआ ?
  • युद्ध का विजेता कौन था ?
  • निष्कर्ष

चौसा का युद्ध किसके बीच हुआ- Chausa Ka Yuddh Kab Hua Tha

यह युद्ध 26 जून सन 1539ई० को चौसा में चौसा का युद्ध लड़ा गया था. यह भारतीय इतिहास का महत्वपूर्ण प्राचीन युद्ध में से एक महत्वपूर्ण युद्ध माना जाता था. जिसमें एक तरफ मुग़ल सम्राट हुमायूँ और दुसरे तरफ से शेरशाह सूरी के बीच यह Chausa Ka Yuddh मध्य लड़ा गया था.

यह चौसा का युद्ध गंगा नदी के किनारे लड़ा गया था. जो चौसा बिहार में स्थित है. इसका मुख्य यह कारण था की हुमायूँ ने दिल्ली की आगे बड़ा पुनर्निर्माण का प्रयास यानि की हम कह सकते है की दोबारा कोशिस किया व उसे सुरक्षित करने के लिए शेरशाह सूरी के आधीन राज्य को छोड़ना पड़ा था. शेरशाह सूरी ने इसी अवसर को उन्होंने फायदा उठाया और चौसा के पास हुमायूँ के खिलाफ आगे बढ़ने का मौका मिल गया.

इस 26 जून सन 1539ई० को “Chausa Ka Yudh” के दौरान, शेरशाह सूरी ने अपने तंत्र का सुझाव दिया और गुरिला युद्ध व भूगोल का बहुत अच्छा उपयोग यानि की हम यह कह सकते है की उन्होंने बहुत पढ़िया प्रयोग करके उसने हुमायूँ को बहुत बुरी तरह से हराया था. इस प्रकार चौसा का युद्ध ने मुग़ल साम्राज्य के इतिहास में महत्वपूर्ण स्थान यानि की जगह बन गया व शेरशाह सूरी को भारतीय इतिहास के महान योद्धा के रूप में जाना जाता है यानि की इन्हों सबसे प्रसिद्ध युद्धाओ में से एक माना जाता है.

1539 के चौसा के युद्ध का विजेता कौन था

सन 1539 ई० के चौसा के युद्ध में विजेता था शेरशाह सूरी था. उन्होंने मुग़ल सम्राट हुमायूँ को हराया और Chausa Ka Yuddh की जीत प्राप्त यानि की हम यह कह सकते है की इस युद्ध में शेरशाह सूरी की सेना जीत गई. इस युद्ध ने उनके नेतृत्व में बनाई दिल्ली सल्तनत की नींव और उन्होंने भारतीय इतिहास में महत्वपूर्ण स्थान प्राप्त किया. इस विजय के बाद, शेरशाह सूरी ने दिल्ली सल्तनत की स्थापना की और भारतीय इतिहास के महत्वपूर्ण सम्राटों में शामिल हो गए. उनका युद्ध कौशल और नेतृत्व था जो इस युद्ध के विजेता बनने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाया था.

चौसा का युद्ध के कारण- Chausa Ka Yuddh Ke Karan Kya Hai

प्रिय स्टूडेंट इस लेख में Chausa Ka Yuddh Ke Karan Kya Hai बताने वाले है. भारतीय इतिहास में 26 जून सन 1539 ईस्वी को “चौसा का युद्ध” के कई अनेको महत्वपूर्ण कारण निचे निम्नलिखित है.

  • हुमायूँ:- मुग़ल सम्राट हुमायूँ ने 1539 ईस्वी को चौसा का युद्ध शुरू यानि की हम कह सकते है की प्रारम्भ किया था. उसका मुख्य उद्देश्य था की दिल्ली को पुनः मुग़ल साम्राज्य का हिस्सा बनाना तथा उनके पिता बाबर की याद में दिल्ली को फिर से विजयी बनाना यानि की दिल्ली पर एक बार फिर से अपने अधिकार में कर लेना.
  • शेरशाह सूरी (फरीद ख़ान):- चौसा का युद्ध के दौरान, शेरशाह सूरी भारतीय इतिहास के महत्वपूर्ण सेनापति और सम्राट था. उनका उद्देश्य यह था की दिल्ली की सल्तनत को अपने अधीन यानि की हम कह सकते है की अपने अधिकार में करना था. शेरशाह सूरी ने अपने सम्राज्य का क्षेत्र बढ़ाना चाहता था.
  • राजनीतिक ग्रीवांव:- चौसा क्षेत्र में सियासी ग्रीवांव भी थे जो युद्ध के कारण बन गए थे. स्थानीय शासकों के बीच विवाद और संघर्ष भी यानि की हम यह कह सकते है की स्थानीय शासको के बिच विवाद भी इस युद्ध के पीछे के कई अनेको कारण थे.
  • स्थानीय सामरिक तयबंदी:- इस युद्ध के समय, स्थानीय सेनाओं ने अपनी सामरिक तयबंदी में सुधार किया था. जिससे उनकी सामरिक क्षमता में बहुत वृद्धि हुई और उन्होंने मुग़लों के खिलाफ़ मजबूत प्रतिरोध यानि की हम यह भगी कह सकते है की उन्होंने बहुत ज्यादा विरोध किया था.

चौसा का युद्ध के परिणाम- Chausa Ka Yuddh Ke Parinaam Kya Hai

प्रिय स्टूडेंट अब इस लेख में चौसा का युद्ध के कारण और परिणाम क्या है. इस के कई अनेको महत्वपूर्ण परिणाम है जो इस लेख में पढने वाले है. सन 1539ई० के Chausa Ka Yuddh Ke Parinaam निचे निम्नलिखित है.

  • शेरशाह सूरी की जीत:- इस सन 1539ई० के चौसा के युद्ध में शेरशाह सूरी ने मुग़ल सम्राट हुमायूँ को बहुत बुरी तरह से हराया था. शेरशाह सूरी ने अपनी विजय की ओर आगे बढ़ा. इससे शेरशाह सूरी ने दिल्ली की सल्तनत को अपने अधीन यानि की हम लोग यह कह सकते है की उन्होंने अपने अधिकार में ले लिया. उनका सम्राट बनने का मार्ग खुल गया था.
  • मुग़ल साम्राज्य की कमजोरी:- हुमायूँ की हार के परिणामस्वरूप, मुग़ल साम्राज्य में अस्थिरता और कमजोरी का समय आ गया था. इससे मुग़ल साम्राज्य की स्थापना में देरी हो गई और उसका स्थिरता प्राप्त करने में कई वर्षो लग गए थे.
  • शेरशाह सूरी का बलिदान:- Chausa Ka Yudh में शेरशाह सूरी ने अपने जीवन की बलिदान दिया और विजय प्राप्त की थी. उनका यह बलिदान उन्होंने भारतीय इतिहास में महत्वपूर्ण स्थान प्राप्त किया और उन्होंने दिल्ली सल्तनत की स्थापना की थी.
  • मुग़ल साम्राज्य की वापसी:- हुमायूँ ने अपनी हार के बाद मुग़ल साम्राज्य की वापसी की कोशिश की और बाद में अपने पुत्र अकबर के द्वारा मुग़ल साम्राज्य को पुनर्निर्माण किया.

चौसा का युद्ध के बाद हुमायूं का क्या हुआ

सन 1539 ई० के Chausa Ka Yuddh के बाद, हुमायूँ को मुग़ल साम्राज्य की बदलती भूमिका का सामना करना पड़ा था. यह युद्ध हुमायूँ की हार का कारण बना और वह अपने सम्राज्य के खो जाने की आशंका में थे. इसके परिणामस्वरूप, वह अपने पिता बाबर की मृत्यु के बाद पाकिस्तान की ही कुछ हिस्सों में बसे रहे और वहां से बीते कुछ सालों में भारत को पुनः प्रवेश करने का मौका प्राप्त किया.

हुमायूँ की आखिरी विजय 1555 से 1556 में हुई और वह दिल्ली की वापसी करके मुग़ल साम्राज्य को पुनः स्थापित करने में सफल रहा था. उनका पुत्र अकबर ने बाद में मुग़ल साम्राज्य को नया जीवन दिया और भारतीय इतिहास में महत्वपूर्ण स्थान प्राप्त किया.

बिलग्राम का युद्ध- Bilgram Ka Yudh Kab Hua

इस लेख में अब चौसा का युद्ध के बाद bilgram ka yudh के बारे में कुछ महत्वपूर्ण प्रश्न का उत्तर पढने वाले है.

इस “Chausa Ka Yuddh” के बाद बिलग्राम का युद्ध, 17 मई सन 1540 को लड़ा गया था और यह एक महत्वपूर्ण युद्ध मानी जाती थी. जो भारतीय इतिहास में यह महत्वपूर्ण लड़ाई मानी जाती है. इस युद्ध के दौरान, मुग़ल सम्राट हुमायूँ और उनके प्रतिपक्ष आफग़ान शासक शेरशाह सूरी के मध्य यह युद्ध लड़ा गया था.

बिलग्राम का युद्ध हुमायूँ के लिए असफल साबित हुआ यानि की हम यह कह सकते है की यह जो युद्ध था वह हुमायूँ के लिए पराजय; हार साबित हुई थी. उन्हें इस युद्ध में बहुत बुरी तरह से हार का सामना करना पड़ा. इसके परिणामस्वरूप, हुमायूँ को अपने पिता बाबर की तरह भारतीय भूमि से बाहर निकलना पड़ा और वे बहुत समय तक भूख-प्यास से तड़पता रहा था.

इस युद्ध के परिणामस्वरूप, शेरशाह सूरी ने अपने आफ़ग़ान साम्राज्य को बहुत मजबूत किया और वह भारतीय इतिहास में महत्वपूर्ण रूप से उभरे. हुमायूँ ने बाद में अपने सम्राज्य की वापसी की, लेकिन इस युद्ध की हार ने उनके साम्राज्य को बहुत कमजोर बना दिया था.

यह रहे विलग्राम का युद्ध जिसे कनौज का युद्ध के नाम से जाना है. यह भी आपके एग्जाम के लिए अति महत्वपूर्ण प्रश्न है. इस प्रश्न का उत्तर आपको बताया गया है.

इसे भी पढ़े:- पानीपत का तृतीय युद्ध 

FAQ

प्रिय स्टूडेंट अब इस लेख में FAQ (Chausa Ka Yuddh) से सम्बन्धित आपके द्वारा कुछ महत्वपूर्ण प्रश्नों का जवाब देखने वाले है. अगर आपके मन में कोई और सवाल है तो आप हमे कोमेंट के माध्यम से पूछ सकते है. यह सारे प्रश्न आपके आने वाले सभी प्रतियोगी परीक्षाओ के लिए अति महत्वपूर्ण प्रश्न है.

चौसा का युद्ध क्यों हुआ था?

सन 1539 ई० में चौसा का युद्ध मुग़ल सम्राट हुमायूँ और आफग़ान शासक शेरशाह सूरी के मध्य यह युद्ध लड़ा गया था. इसके पीछे कई कारण थे.

1540 में कौन सा युद्ध लड़ा गया था? और कन्नौज की लड़ाई कौन जीता?

सन 1539 ई० में चौसा और सन 1540 ई० में कन्नौज की लड़ाई को शेरशाह सूरी ने जीता था. इस युद्ध में मुग़ल सम्राट हुमायूँ को हराकर था. शेरशाह सूरी ने भारतीय इतिहास में महत्वपूर्ण स्थान प्राप्त किया था.

1540 में कौन सा युद्ध लड़ा गया था?

आपको बता दे की सन 1540 ई० में चौसा का युद्ध लड़ा गया था. इस युद्ध में जिसमे शेरशाह सूरी ने इस युद्ध में विजय यानि की जीत हासिल की थी.

शेरशाह ने हुमायूँ को कितनी बार पराजित किया?

शेरशाह सूरी ने हुमायूँ को दो बार पराजित यानि की हम कह सकते है की शेरशाह सूरी ने हुमायूँ को दो बार बहुत बुरी तरह से हराया था. Chausa Ka Yuddh में हुमायूँ की हार के बाद, उन्होंने हुमायूँ को एक और युद्ध, जिसे “बिलग्राम का युद्ध” के नाम से जाना जाता है. उसमे भी हराया था.

प्रिय विधार्थियों इस लेख में चौसा का युद्ध क्यों हुआ और इस का क्या क्या कारण व परिणाम थे. इस लेख में सारे टॉपिक को एक-एक कर के पढ़ चुके है.

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